Thursday, 24 May 2012

आरोप .....

वो पल जब अलग हुई
साँसो की भाषा ,
जब आलिंगन की बेहोशी से
उठ
दो भिन्न दिशाओं को ,चल
दिये थे हम ।
किसी अंजान से ब्रह्मांड में ,
एक धूधली सी परछाई मे
चल ,पड़े थे हम ।
एक अज्ञात भविष्य ,
सामने मुह फाड़े खड़ा था ,,
और भीतर
का कोमल कंपन करता
हृदय
अंतिम याद को संजोने
पीछे मुड़ना चाहता था ।
एक रेखा जो दूरी की
इकाई बनती जा रही थी ,
बढ़ती चली जा रही थी ।
कम करना ,,मिटाना मुश्किल था
इसके
दोनों छोरो पर
अवसादों की खोखली दलीले थी ,
व्यर्थ के आंसुओं से बुझती दीपे थी ।
दूरी बढ़ाती रेखा का विस्तार
"अखंडता का परिचायक था"
भावों की हत्या थी ।
.
.
दोनों तरफ घसीटे जाते
दो उन्मादी जा रहे थे ,,
जिन पर संस्कृति
के हनन का
आरोप था ......

.....राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Wednesday, 23 May 2012

तृप्ति ..........

धीरे से जुल्फों के
मधुर गीत बज उठे थे ,
जब ,
चाँदनी ने मेरे स्पर्श पर
उसे छेड़ा था ।
नज़रों के खेल मे
उसके
सारे आग्रह प्रस्तुत हुए
और
बाहों ने बाहों को घेरा था ।
रक्त मे व्याप्त कितने
अश्व ,सारथी को
तलाशते
फिर रहे थे धमनियों मे
प्रवेश को आतुर थे
ऊष्मा ने जहां
षड्यंत्र रचा था ।
व्याकुलता के तीर गड़
रहे थे ,
अधरों से नीर झर रहे थे ,
पहचान साँसो की
भला कैसे होती ?????
सांस राग एक साथ
एक हो बज रहा था ।
कुछ भाव संचारित हुए
एक दूसरे मे ,
एक दूसरे के ।
हृदय ने स्वागत किया
उँगलियों की जकड़न
कसती सी बताती थी ....
अन्तर्मन हो चुका तृप्त था .....

..........राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Saturday, 5 May 2012

द्वंद ..........

जब रात सोती ,
थक हार तेरे आँचल मे
तेरी ज़ुल्फों से और,,
काली हो जाती ।
माटी की दीवार पर
पीठ टिकाये ,
कल के सुंदर होने की
परिकल्पना से
अंतरप्राण मे नवीन
ऊर्जा भरती ।
छिद्र युक्ता छत के नीचे
दो देह की पहचान
को चंद्रमा प्राय देखता ,,
और
उभरी सी साडी
के पाढ़ को रात भर
धरती छूती रहती ।
रात के इस नैसर्गिक
सुख के उपरांत ,,
सुबह रोज़ की तरह
आती ...... और
कंधो पर लाद देती
जीवित रहने का प्रश्न ।
स्वाधीन होने का प्रश्न।
उन मनसिकताओं से
जो मानव मूल्य को
हैं
तोड़ती ।
सूखने न देती ,,और
न ही मूल्य देती
उन बूंदियाते पसीनों के
जो व्यर्थ नष्ट होते ,,,
और
किसी की दुनिया
सजती
जाती .............

............राहुल पाण्डेय "शिरीष "

Thursday, 26 April 2012

आँखों की नमी .........

मेरी आँखों की नमी
पैरहन थी
उसकी यादों की ,
आज जो बह चली
आज शब गुजरने
को हुई थी ,
डुबना चाहा था
किरणों संग उस पार
पर ,
उन रश्मियों की कड़िया
शायद कुछ कमजोर थी ,
भाप बनाती रही
जिसे
आँखों की नमी ।
जिसकी आकृति खोजता
हुआ ,रोज़ चाँद की
छवि बदलता ,,
रकाबत करता चाँद
उसकी खोज से
जो बढ़ा देती
आँखों की नमी ।
हर रात गुजरती एक
मुराद पाले ,
की आफताब संग
सुख जाएंगे आँसू ।
उम्मीदों को परम आकार
मिलेगा ,
पर
हर बार
आकार के रेखांकित
आवरण को
मिटा देती
आँखों की नमी .........

................राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Saturday, 14 April 2012

मैं रोता जाता ...................

झाँकती नज़रें ,
धुंध की सतह पर ,
प्रभाव डालती ,छेड़ती
उस अंतरंग की खोज मे
व्याकुल हृदय से पुकारती ,
मन,अशांत बादल सा गर्जन
करता ,
बरस न पता ,भीतर ही भीतर गूँजता
रहता ।
उस निशा जब विदा हुई यादें
अकेलापन दिखा घर बनाते ,
चाँद भी असहाय अटका रहा
फ़लक पर
देखता रहा अपनी चाँदनी संग ,
मुझे आँसू बहाते
उन जटिल संदर्भों की व्याख्या
था मैं करता ,सुनाता
उसे समझता ।
इस विकट परिस्थिति मे
साथ उसका मिल न पाया ।
जिसके संग अनुभूतिओं का संचार
किया था ,
जिससे मैंने प्यार किया था ।
जो अकड़े टूट गए ,
शफाफ़्फ से उन अर्थों
का बोध होता ।
सक्रियता -सिथिलता मे
खोती जाती ।
धुंधली सी उसकी याद मे
मैं रोता जाता
मैं रोता जाता .........

.................राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Saturday, 31 March 2012

नाजुक डोर ........

व्यथित मन ये तेरा मेरा
सताता ये घना अंधेरा ,,
काल-चक्र के रिसते लहू
से ,,,
कैसे कर दूँ प्रिये
श्रिंगर तेरा ?

वो अमिट शीला सी स्मृति
जिसकी छाई से बनी
अनुभूतियों की सृष्टि
इस ज्वलंत जग मे
कैसे दे दूँ प्रिये
सरोकार तेरा ?

इस नीरस जीवन सफर मे
उम्मीद टूटी हर डगर मे
अधिकार-वांछित ही रहा ,,
कैसे पा लू प्रिये
अधिकार तेरा ?

नाजुक से वो डोर टूटे
जैसे फूलों से ओस रूठे
इस जीवन के घोर द्वंद
कैसे पा लूँ प्रिये
प्यार तेरा ?

...........राहुल पाण्डेय "शिरीष "

Tuesday, 27 March 2012

त्रिकोण .....

वो त्रिकोण ,
जिसकी तीन कोने हैं ,
तीनों की इकाई जानना चाहता हूँ ,
पर समझ नहीं प रहा ।
जो तीन रेखाओं से बंद है ,
तीन रेखाएँ जुड़ी हैं ,
और ......
कोण बनाने मे
तीनों रेखाओं ने एक दूसरे को काटा भी था ।
इस कोण से बाहर निकलती
रेखा को मिटा दिया गया ......
कमजोर थी ।
उसका अस्तित्व मिट गया ।
पर मिटाने के बाद
जो दाग रह गया है ,
सबूत वो भी था,,
पर ,,
शायद इसलिए मिटाने का प्रयत्न न किया
की
फिर कोई दूसरी ,,
नयी ,,
रेखा बाहर निकालने की न सोचे ।
अब देख रहा हूँ ,
छोटे-छोटे आयत बनते ....
पर ये
रेखा से नहीं बने ,
बिन्दु मिलकर रेखा के
समान लग रहे हैं ।
ये शातिर हैं ,,,
अलग होकर रहते ,
पर ,
नयी पृष्टभूमि के वक़्त एक हो जाते ।
घनत्व को मूक कराते ,
त्रिकोण को फिर से रेखांकित करते ,
मजबूती देते
कोण मे आ चुकी फांक को ,,
और फिर फस जाता घनत्व आयत मे ,,
आयत को त्रिकोण बंधे रखती ,,,
पर याद आता है ,
ये त्रिकोण
कभी समकोण भी था । ....................राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Sunday, 25 March 2012

बारिश ..........और बातें ,,,,,,,,,,,,,,

कल रात बारिश आई थी ,
खिडकीओं पर बूंदों ने दस्तक दी ।
उसकी बातें लेकर आई थी ,जिसे
रात भर सुनाती रही ।
उसने हवाओं पर जो लिखा था ,
नमी लिए मेरे आँगन मे कल
बरस रही थी ।
मेरे छत के कोने से टपकता
हर एक बूंद ,
उसके चेहरे सी लगती ।
जो माटी से मिलते ही
मटमैली हो जाती ।
बारिश कह रही थी ,
"वो त्रस्त है
तेरी यादों की जमीं मे
इतनी उर्वरक शक्ति है जो
हमेशा आंसुओं की नयी फसल
तैयार कर देती है ।
और वो
काटते-काटते थक जाती है ।
खिड़की से अब चाँद भी नहीं दिखता
नीम की टहनियाँ बढ़ गयी हैं ।
बाबा से कैसे कहूँ कटवा दे ...इन्हे ।
की तुमसे बात करने मे ये अवरोध बनते हैं ।
बिस्तर का माप आज पता चला है ।
जब ऊर्जा सक्रिय होने लगी है ......
......और तुम नहीं हो ! !
रात दिन कट जाते हैं ।
एक धागे से सिली हुई बेमन सी
हंसी ,,जो अटकी रहती है गालों पर
जिसके एक अंश इधर-उधर
होने से ,,,रोने और हसने का पता चल जाए ।

....
...
अचानक बारिश बंद हो गयी
मैं सोच मे था ,,वो चली गयी
पर मैं भीग रहा था ,,
मेरे सामने थे कटीले तार,,,,
,,,पत्थरों के बीच बैठे मेरे साथी ,,,,
और पीछे ,,,,
वो
जो मेरे एक शब्द को तरस रही है ,,,,,,,

............राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Thursday, 22 March 2012

परिधि..........

जब भी देखता हूँ
खुद को एक परिधि
में पाता हूँ ।
जिसका निर्माण मैंने
खुद नहीं किया था ।
समाज के अवसाद
और
विकृत तार्किक
ख्यालों ने
मेरे चारों ओर एक घेर
बना दिया है ।
जिसे मैं परिधि
कह रहा हूँ ।
मुझे लगता है की मेरे
पूर्वजों का भी जन्म
इसी में हुआ होगा !!!
पर क्यों उन्होने इसे
मान लिया ?
इसे मिटाने का प्रयास
क्यों नहीं किया ?
क्योंकि शायद उन्हे
पसंद आता होगा की ,,
निम्न लोग(जिन्हे वो समझते थे )
उनके सामने चप्पल माथे पर
रख कर जाए .........
जिससे वो अपने उच्च कूलीन के
होने की परिभाषा दे सके !!!!!!
पर वर्तमान की स्थिति क्या है ?
मेरे साथ .... वो पूर्वज क्या जाने ?
वो छः धागे जो मेरे कंधे से
कमर तक झूलता है ,,
उसे देख ,मेरे (शायद पूर्वज )के
अपराधी होने का बोध कराते हैं ....
वो (निम्न -जिसे पूर्वज समझते थे )
इस घेरे की दीवार इतनी बुलंद ,,
और ऊंची है ।
कई बार प्रयास किया हूँ निकालने का
पर ,,,,,,
इसकी चुभनशील सतह से छील
जाता हूँ मैं ॥
टूट जाता हूँ मैं ,,,,,,
एक अप्रियता झलकती है ,
उनके चेहरे से मेरे प्रति ,,
उनकी साँसों से एक बू आती है
हीनता की ........कोई कैसे समझाये ,,
कोई कैसे भेदे ....
मैं तो अवसादों मे जन्मा ,,पला ...बढ़ा ॥
पर मैं चाहता हूँ ,,अपना सारा कुछ
लेकर जाऊँ ,,
बस इतना छोड़ जाऊँ ...
की मेरी भविष्य की पीढ़ी को
अपमानित न होना पड़े ........

....................राहुल पाण्डेय "शिरीष"

अंतरक्रंदन ..........

उसकी यादों से फूटता अंतरक्रंदन ।
मेरी मनोदशा बताती है ,
की किस तरह मेरी भावनाओं
का दमन हुआ है ।
जैसे की रात के अचानक
चले जाने पर
आकाश से तारे
छिन लिए जाते हो ।
अब यह भी बोध नहीं होता की
वो मुझमे आमीज है
या ,,,,,
पृथक कर गयी है मुझे
अपने हर एक छुवन से ।
वो क्षण जब मन अचल होता है
अंधकार मे दबे भाव
कुरेदते है
स्मृतियों को ।
अज्ञात सी अनुभूति होती है ,,
उस क्षण....
पेड़ की वो शाख जिसके सामने
हम बैठते थे .....
जो नदी की धारा से
छूता रहता था ,,,,,
हम कहते की ये
प्रेम कर रहे हैं ।
पर ॥
वो धारा तो उसे
गला रही थी ।
आज जब अकेले बैठा
वहाँ तो देखा
की वह हिस्सा
नहीं है अब पेड़
के पास ,,,,
जैसे की तुम
मेरे पास नहीं
हो .........


..............राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Thursday, 15 March 2012

अनुत्तरित प्रश्न ....

आज भी वो प्रश्न अनुत्तरित है
जो भूत से हम ढोते आ
रहे हैं ।
प्रश्न ये है ;की
क्या
वो आज़ाद है
या फिर
उड़ रही है ,
पर
डोर आपके
हाथों में हैं ?

उसकी संयम की कथा ॥
इतिहास मे होगी (देखिएगा)
जिसको दोहराती आई है
आज तक वो .....
कितनी पीढ़िया बीत चुकी ..
कितने जमाने गुजरे ....बदलें
उसका रूप बदला ॥सौन्दर्य
----परिमार्जित हुआ ।
पर संयम-वृति
ज्यों-के-त्यों
ढोती आई है
आज तक वो ....

उसके रक्त-स्राव
से लेकर अंगा तक
पर
आलोचना की
गयी ।
विकृत मानसिकता का
चित्रित
वर्णन का सामना
करती आई है
आज तक वो ....

वो एक अदृश्य सा ज़ंजीर
पहनी है गले मे ।
जिसकी कुंजी
उसके पास नहीं है ,,
वो लाचार है .......
पर हम से ज्यादा
प्रगतिशील ।
वो नाखून से घिस काट
देगी ...जंजीरों को
एक दिन ,,
जिससे
बंधित
थी ,,है
आज तक वो ....

ये प्रश्न कब सुलझेगा ?
क्या उत्तर है तुम्हारे पास ?
धाराएँ अनुकूल कब होंगी ?
जिसकी ढेव से फिसलता
रहा है ये प्रश्न ,
और जिसकी समीक्षा/हल की
आस मे है ......
आज तक वो ....

......राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Tuesday, 13 March 2012

सीवन उभरी है आज ....

यादों के पर्दों की सीवन
उभरी है आज ।
अंतरपट के मंच के किरदारों
को अंशुमाला मिलेगी ।
वो तमस को भेद आएंगे ,
जो अकारणीय धूमन में
गुम हुए थे ।
नातवान समझा जिसे
लोगो ने
पृष्टभूमि कल की बदलने
निकले हैं आज ।
तौफीक थे उनके स्वर
बंदिश बना दी
गैहान ने
बुलंदियों पर
दस्तक देगी आज ,,,,,
यादों के पर्दों की सीवन
उभरी है आज ।

......राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Friday, 9 March 2012

रात कुछ यों बीती.....

पहाड़ो पे रात
कुछ यों बीती ,
की धुंध पे नंगे पांव
भटकते रहें ।
तरंगो की तानों मे
उलझती जुल्फें उसकी
रात को और
काली ,,
नशीली ,,
रोमानी कर गयी ।
चाँदनी के धागे
ओस संग मिल
रात भर झरते रहे
नैनो से।
मौन रहे हम ,,
देह की ऊष्मा ,,
सुनाती रही,
आप बीती ....
पहाड़ो पे रात
कुछ यों बीती ....
फ़लक के आँचल मे
जड़े नक्षत्र ,
किसी बारात सा सज रहे थे ,
और ,पेड़ की झुरमुठ
से झाँकता चाँद ......
बिस्तर की सिलवट ,,
देखता ,,
शरमाता ,,
बिना टोके चला जाता ।
रोम रोम पुलकित
कंपित स्वर ,
स्पर्श भेदती अंतरमन को
साँसे भी टकराते रहे
रात कुछ यों हुई
प्रीति ....
पहाड़ो पे रात
कुछ यों बीती ......

.........राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Wednesday, 7 March 2012

मुलाक़ात .....

पहली से पहेलियों मे
बदल गयी ,,,,
वो मुलाक़ात ....
निगाहों से दिल तक
उतर गयी वो ....
बस,होठ थे खामोश ॥
मन के किताब ,,के आवरण
से हर पृष्ट तक ,,,,
बिखर गयी ,,,
वो मुलाक़ात ....
दिवाली मे होली सा
रंग गयी ,,,,
वो मुलाक़ात ....
मधुर गंध सा चमन
मे बिखर गयी वो ।
आज तो अपना बिस्तर भी गुलों
का सेज लगता है ।
सागर मे डूबते सूर्य की मोहकता
सी थी ,,,,
वो मुलाक़ात ....
धुंधला को स्प्स्त्ता का रूप
दे गयी ....
वो मुलाक़ात ....
अवनी को तृप्त कर
गयी वो ....
आज तो विरह की
इमारत भी डगमगा गयी
रेत पर रजनी सा
पसर गयी ,,,,
वो मुलाक़ात ....

.......राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Thursday, 1 March 2012

ऐसी बारिस होती ......

प्रथम प्रेम की वादि
में
कुछ ऐसी बारिस होती है |
प्रेम सिफाल* है,उन
अभिव्यक्तियो की
जिसकी दीवारें इतनी
शफ्फाफ* होती हैं
पहली दफा ......
की
नफ्स* कस्समे-अजल*
बन जाता है अपना |
उन पेचिद्गिओं
की लम्स* जजीरों*
पर भी
तारों का ढेर लगा
देते हैं |
रूह के मिलन की
मतर*
मदारे-जीस्त*
बन जाती है |
जिस्मो की रौह*
रोबरू होती
निशा के आँगन में
चाँद जलता है,,,देख के | |
तस्लीम* करता उन
घटकों का
जिसके ताकों पर
रिश्तों की
हत्या होती है |
प्रथम प्रेम की वादि
में
कुछ ऐसी बारिस होती है |

..........राहुल पाण्डेय "शिरीष"
(कुछ उर्दू शब्द के हिन्दी अर्थ )
{१*मिट्टी का बर्तन ,२*निर्मल ३*प्राणी ४*भाग्य लिखने वाला,५*स्पर्श ,६*शून्य,७*वर्षा,८*जीवन की निर्भरता ,९*खुसबू ,}

Tuesday, 28 February 2012

अर्थबोध ....

अंतरमन का अर्थबोध
भला कैसे हो ?
किस शैली में रचा जाए?
कितने शब्दों की पंक्ति हो?
बादल सी विशाल मनोवृति ,उसे
बूंद कहना ,शायद गलती हो ,
सन्दर्भों की समीक्षा जटिल ,
आशाओं की सार्थकता
कैसे हो ?
अंतरमन का अर्थबोध
भला कैसे हो ?
धुंध सी छाई स्मृति
में अक्स आवरण बने ,
सामीप्य था,मन का दिल से,
भावों की ऊष्मा .मेघ बने |
युगों से संजोये यादों के
चिन्ह मिट जाए,,,,कैसे हो ?
अंतरमन का अर्थबोध
भला कैसे हो ?
निर्जन बस्ती के ,तिमिर प्रकाश में
अनायास चाँद का पदार्पण हुआ
अवेवास्थित मन के कमरे में
उसका सत्कार कैसे हो ?
उसने मुझसे ,मैंने उससे
जो सपने देखे
उनका सरोकार कैसे हो ?
अंतरमन का अर्थबोध
भला कैसे हो ?

............राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Friday, 24 February 2012

वो,मैं,और प्रेम ....

रात काली,सुहानी सी,
सलोनी थी ,
खेलती थी ,तेरी तरंगो से |
बितती घड़ियाँ ,
सुनती आहट,
पाती सरोकार हमारे
यौवन की |
जिस डगर को
हमने चुना था |
भटकती ज़िन्दगी ,
सहारा खोजती ,
राहों को जा मिली ,
उसी की |
विरह की वेदना ,
प्रबल थी |
किसी बीते ज़माने में
आज प्रश्नों के
सूचक उलटे पड़े
हैं ,उसी के |
गहरे थे भावों के
स्त्रोत ,आत्मा के
कोने में ,संजोये
हमने ,
सपने ,
अपने ,
उसी के अनुपात की |
टूट कर साकार हुआ ,
प्रेम कोई
किस्मत नहीं ,
ये सार है एक
कोशिश की |

.........राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Thursday, 23 February 2012

एहसास ...

वो आती ,अपना बनाकर
एहसासों के फुव्वारे
से भीगा जाती |
वो शून्य में प्रवेश कर ,
ख्वाइशों के बिखरे
पन्नो को समेटती |
अन्तर्मन के तम में ,
झांकती ,पुकारती
मुझे,मुझसे पहचान कराती |
भावों के टूटे रेशों पर
गगन-चुम्बी शिखरों
सी आशाएं सजाती |
वो आधार सा बन कर
विश्वास की टूटी पुलिया की
धूल भरी
सड़क पर अपने महावर
से रौनक लाती |
तारों से ज्योति लेकर
जुल्फों में अगरचे की
खुशबु सवारे
विरानीओं में फूलों की
सेज सजाती |
वो आती ,अपना बनाकर
एहसासों के फुव्वारे
से भीगा जाती |

......राहुल पाण्डेय "शिरीष "

समर्पण ....

खुद को तुझे समर्पित करना ,
खुद को मुझे अर्पित करना ,
युगल भावों से सपने गढ़ना ,
निशा-रवि की जुगलबंदी में .
अपनी एक अवनी धरना ,
बातों और तर्कों से ,देखो
भेदेंगे हमें लोग यहाँ के ,
तरह-तरह के तंज कसेंगे
फिकरे देंगे ,बिखरा देंगे
तृप्ति के उन मूल्यों को
संजोना ..........
खुद को तुझे समर्पित करना ,
खुद को मुझे अर्पित करना ,
हम नया एहसास देंगे
अपनी कथा को सारांश देंगे
विगत युगों की परिभाषा को
हम नयी पहचान देंगे
दर्द की काली रात को
हम नया प्रकाश देंगे
मेरे लिए सदेव
प्रेरणा का स्त्रोत बनना
खुद को तुझे समर्पित करना ,
खुद को मुझे अर्पित करना ,

.........राहुल पाण्डेय "शिरीष"

Wednesday, 22 February 2012

जाने कैसी अब्र होती है कवि की !......

जाने कैसी अब्र होती है कवि की !
शब्दों के पौध ,
रेंगते-रेंगते ,खड़े हो जाते हैं ,
और,
नयी कविता बन जाती है उसकी ,,
जाने कैसी अब्र होती है कवि की !
चाँद की रौशनी में,
तारों की खेती करता है,
लाखों लोगो की मनोवृतियों को ,
स्वंय महसूसता है |
अपनी कलम से उनकी ,
आवाज बनता है ,
जो पिसते हैं
काल-चक्रों के पत्थर में |
वो तीव्र ढाल का अवरोधक बनता है,
जहाँ से सामाजिक मूल्य
बेसहारा गिरते हैं |
वो कसौटी बनता है बदलाव की |
जाने कैसी अब्र होती है कवि की !
प्रेम की ज्योत से तम मिटाता है ,
किसी के दिल में झांक,
उसे अपना बना जाता है |
चाँद-सूरज एक साथ होने की
कल्पना ,,,
और ,,कोई
क्या कर पाता है ?
बारिश के बूंद से अश्क
अलग करता है |
शायद शब्दों की माला बनी
है इसके आंसुओं की |
जाने कैसी अब्र होती है कवि की !
वो हँसता है ,गाता है ,
अपनी नज्में सुनाता है |
हम "वाह-वाह","क्या खूब "
करते हैं |
वो तो अपने साथ घटित घटनाओं
को बताता है |
वो जीता है हमसे,हमारे एहसास
को बढाता है |
प्रेम-वियोग सारी अवस्थाओं में
हमारा साथ निभाता है ,,
क्या हमने कभी कोशिश की
है उसे जानने की ?
जाने कैसी अब्र होती है कवि की !

..... राहुल पाण्डेय "शिरीष"