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Saturday, 29 October 2011

बित्ती बातें

अब  तो कुछ  यूं हालात  हैं,
 न  जीने  की  राह  है,न  मरने की बात  है,
अब तो दूसरों  के जुमलों  से  काम  चलाते  हैं,
मेरे  ऊपर तो  खुद किसी  के  निशान-ए-घात  हैं ।

रेतीले  तट की  चाँदनी पर  देखा तुझे उस रात ,
उड़ती  लट्टे,बिखरा  योवन,जाने किसके  साथ,
आज तो मेरे पास हो कर भी मुझसे दूर है ,
मार दूँ  या खुद मर जाऊँ लेकर तेरे हाथ ।

मैं  तो  फन्ना होने को  तैयार  था
भू -गर्व में पालक  मूँद कर  सो जाने को  तैयार था ,
तुम  होठो  के  लिफाफे को  खोल  कर  बोल देती ,
मैं  तो  सारा गरल पी  कर  तुम्हें  अमर कर  जाने  को  तैयार था ।

रीति रिवाजो की  दुहाई  देती  है  वो
अपने बद्दपन  की सफाई देती  है वो ,
मैं तो पहले की तरह मौन आज भी  सुनता हूँ ,
"शिरीष" आज भी अपने बचाओ मे गवाही देती है वो ।

एक बार तो कुछ यूं हो जाता ,
मेरा नूर मेरा गुरूर  हो जाता ,
फिर तो मैं सारी दुनिया  से मुह फेर लेता ,
अगर मेरी ख्गुमारी पर उसका  सुरूर  हो जाता ।

आत्मा संघर्ष  के  राह पर चलती  रही ,
रातों  में दिये बुझे ,दिल की धड़कन जलती रही ,
चरित्रहीन तो हम थे तुम्हारे  लिए  हमेशा से ,
तो फिर तुम क्यौ ?अपने अतीत  को  जमाने से बचाती रही ।

                                                                                      ---     शिरीष